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दिल्ली बनेगा अनूपपुर? अनूपपुर मुख्यालय के आसपास भी रहना होगा मुश्किल ।

संविधान, कानून और जनहित की कसौटी पर टॉरेंट थर्मल पावर प्रोजेक्ट - आदर्श दुबे

 

अनूपपुर आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहाँ विकास के नाम पर विनाश का रास्ता चुना जा रहा है। जैतहरी क्षेत्र में प्रस्तावित 1600 मेगावाट का टोरेंट पावर थर्मल प्रोजेक्ट केवल एक औद्योगिक इकाई नहीं, बल्कि जिले की हवा, पानी, खेती, जंगल और मानव जीवन पर सीधा खतरा बनता जा रहा है।

सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि अनूपपुर जिला मुख्यालय से मात्र 10–12 किलोमीटर के दायरे में दो बड़े क्षमता वाले थर्मल पावर प्लांट स्थापित हैं और एक और नया प्रस्तावित है और लगने बाला हैं।

इनके बीच अनूपपुर शहर और लगभग 150 गांवों की आबादी सांस लेती है, खेती करती है और जीवन यापन करती है। सवाल यह है कि क्या किसी एक ही तहसील पर इतना भारी प्रदूषण का बोझ डालना न्यायसंगत है?
हवा जहरीली, भविष्य धुंधला
आज अनूपपुर का AQI औसतन 110 के आसपास है, जिसे पहले ही स्वास्थ्य के लिए असंतोषजनक माना जाता है। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि तीन थर्मल प्लांटों के संयुक्त प्रभाव से यह स्तर 250 या उससे अधिक तक जा सकता है। इसका अर्थ साफ है—
बीमार बच्चे, सांस से जूझते बुजुर्ग और एक ऐसा शहर, जहाँ खुली हवा भी ज़हर बन जाए।
क्या अनूपपुर को भी दिल्ली की तरह “गैस चैंबर” बनाने की तैयारी है?
सोन नदी: जीवनरेखा या औद्योगिक नाली?
सोन नदी केवल जलस्रोत नहीं, बल्कि अनूपपुर की कृषि, पशुपालन और जीवनशैली की रीढ़ है। थर्मल पावर प्लांटों के लिए भारी मात्रा में पानी का दोहन और गर्म, रसायनयुक्त पानी का डिस्चार्ज नदी को धीरे-धीरे मृत नदी में बदल सकता है।

नदी मरेगी, तो खेती मरेगी—और खेती मरी, तो गांव उजड़ेंगे।

मुआवजा, जमीन और रोजगार: तीनों पर सवाल।

परियोजना से प्रभावित किसानों का आरोप है कि मुआवजे में भारी विसंगतियां हैं। कहीं जमीन का सही मापन नहीं, कहीं उपजाऊ भूमि को कम कीमत पर आंका गया।
जमीन स्थानांतरण की प्रक्रिया भी संदेह के घेरे में है—क्या सहमति वास्तव में स्वतंत्र थी या मजबूरी में ली गई?

रोजगार के वादे भी धुंधले हैं।

कितने स्थानीय युवाओं को नौकरी मिलेगी? स्थायी या अस्थायी?

योग्यता का आधार क्या होगा?
इन सवालों के जवाब आज तक स्पष्ट नहीं हैं।
विकास किसके लिए?
यदि विकास का मतलब है—
जहरीली हवा ,सूखती नदियाँ ,बंजर होती खेती,बीमार होती पीढ़ियाँ
तो ऐसे विकास पर पुनर्विचार जरूरी है।

संविधान नागरिकों को स्वच्छ हवा और सुरक्षित जीवन का अधिकार देता है, फिर अनूपपुर की जनता से यह अधिकार क्यों छीना जा रहा है?
जनसुनवाई औपचारिकता नहीं, जवाबदेही हो।

7 जनवरी को प्रस्तावित जनसुनवाई केवल एक सरकारी प्रक्रिया नहीं होनी चाहिए। यह जनता के सवाल सुनने, जवाब देने और सच में निर्णय बदलने का मंच बननी चाहिए।
विकास चाहिए—लेकिन जीवन की कीमत पर नहीं।
अनूपपुर दिल्ली नहीं बनना चाहता।
वह अपने जंगल, अपनी नदियाँ, अपनी खेती और अपनी सांसें बचाना चाहता है।
अब फैसला सरकार और व्यवस्था को करना है—इतिहास में अनूपपुर को विकास के नाम पर कुर्बान करने वालों में गिना जाएगा या उसे बचाने वालों में।

लेखक परिचय

आदर्श दुबे अध्यक्ष अखिल भारतीय पत्रकार कल्याण संघ मध्य प्रदेश

ब्यूरो न्यूज नेशन ।
संपादक थर्ड आई हैं।

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