हाथियों का आतंक और वन विभाग की सुस्ती: लोग याद कर रहे हैं पूर्व डीएफओ श्रद्धा पेन्द्रों को @रिपोर्ट – आदर्श मिश्रा

अनूपपुर, आदर्श मिश्रा।शासन, प्रशासन व आमजनमानस किसी जिम्मेदार अधिकारी की कार्यप्रणाली को तब ही समझ पाता है जब वह व्यक्ति पद से हटने के बाद पीछे अपना प्रभाव छोड़ जाता है। कार्यकाल के दौरान कई बार लोगों को उसकी मेहनत का एहसास देर से होता है, लेकिन जब वही स्थान किसी गैर-जिम्मेदार या अकर्मण्य अधिकारी को सौंपा जाता है और परेशानियां बढ़ती हैं — तब ही पूर्व अधिकारियों की प्रतिबद्धता और कार्यशैली लोगों को याद आती है।
ऐसा ही एक उदाहरण है अनूपपुर जिले की प्रभारी वन मंडलाधिकारी रही श्रद्धा पेन्द्रों का।
जहां एक ओर आज के डीएफओ विपिन पटेल के कार्यकाल में वन विभाग की कार्यप्रणाली बुरी तरह चरमरा गई है, वहीं दूसरी ओर श्रद्धा पेन्द्रों जैसी साहसी, मेहनती और कर्तव्यनिष्ठ महिला अधिकारी को आज भी लोग याद कर रहे हैं।
डीएफओ विपिन पटेल के आने के बाद से विभाग की स्थिति पूरी तरह बिखर चुकी है।
साहब न तो विभागीय दायित्वों को गंभीरता से लेते हैं, न ही ज़मीनी स्तर पर सक्रियता दिखती है। उनकी दिनचर्या बंगले और कार्यालय के बीच सिमटी रहती है। आमजन से संवाद और विभागीय मॉनिटरिंग का लगभग अभाव है।
जिले में पिछले 10 वर्षों से जंगली हाथियों का आगमन होता रहा है, लेकिन पहले के अधिकारियों द्वारा बनाए गए मास्टर प्लान के चलते स्थिति नियंत्रण में रहती थी। अब यह नियंत्रण पूरी तरह समाप्त हो गया है। वर्तमान वन अमला हाथियों से लेकर अन्य वन्य संकटों पर पूरी तरह विफल साबित हो रहा है।
सिर्फ़ पिछले वर्ष की बात करें तो, दक्षिण वन मंडल शहडोल से कुछ माह के लिए अनूपपुर में प्रभारी डीएफओ रहीं श्रद्धा पेन्द्रों ने दिन-रात मेहनत कर कई वर्षों से चली आ रही अव्यवस्था को सुधार दिया था।
उनके कार्यकाल में:
- अवैध खनन, पेड़ों की कटाई और वन्यजीव शिकार जैसे मामलों पर सख्त कार्रवाई हुई।
- विभागीय कामकाज अनुशासित हुआ।
- उनके नाम से ही अवैध कारोबारियों में खौफ व्याप्त था।
एक बड़ी घटना जैतहरी रेंज के पगना क्षेत्र में घटी थी, जहां एक जंगली हाथी ने व्यक्ति को कुचलकर मार डाला। उस समय डीएफओ मैडम ने मोर्चा खुद संभाला, पीड़ित परिवार के साथ खड़ी रहीं, और 24 घंटे के भीतर संभाग, प्रदेश व अन्य राज्यों की संयुक्त टीम बुलाकर हाथी को काबू कर कान्हा नेशनल पार्क भेजा गया।
आज भी जिले के लोग वह समय याद करते हैं जब अधिकारी थकते नहीं थे।
आज हालात ऐसे हैं कि डीएफओ साहब को लोगों से मिलना, जागरूकता फैलाना, या सुरक्षा व्यवस्था को लेकर कोई फुर्सत नहीं है।



